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रेपो रेट (Repo Rate): अर्थ, महत्व और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
हर आधुनिक अर्थव्यवस्था में केंद्रीय बैंक की एक अहम भूमिका होती है। भारत में यह ज़िम्मेदारी भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) निभाता है। RBI वित्तीय प्रणाली में तरलता (Liquidity), महँगाई (Inflation) और आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए कई उपकरणों का उपयोग करता है। इन्हीं में से एक है रेपो रेट (Repo Rate)।
रेपो रेट क्या है?
रेपो रेट वह ब्याज दर है जिस पर RBI देश के वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक अवधि (आमतौर पर 1–14 दिन) के लिए धन उधार देता है।
यह उधार सरकारी प्रतिभूतियों (Government Securities) को गिरवी (Repurchase Agreement) रखकर लिया जाता है।
रेपो रेट क्यों महत्वपूर्ण है?
1. महँगाई (Inflation) को नियंत्रित करना
- जब महँगाई ज़्यादा बढ़ती है, RBI रेपो रेट बढ़ाता है।
- इससे बैंकों के लिए RBI से उधार लेना महँगा हो जाता है, बैंक भी ग्राहकों को महँगा कर्ज देते हैं, जिससे बाजार में पैसे की मात्रा कम होती है और महँगाई घटने लगती है।
- जब अर्थव्यवस्था धीमी पड़ती है, RBI रेपो रेट घटाता है।
- इससे बैंक आसानी से सस्ते दर पर कर्ज ले पाते हैं और लोगों को भी कम ब्याज पर लोन मिलता है, जिससे बाजार में पैसा बढ़ता है और आर्थिक गतिविधियाँ तेज होती हैं।
2. बैंकों के लोन और EMI पर असर
रेपो रेट में बदलाव का सीधा प्रभाव आम लोगों पर पड़ता है:
- रेपो रेट बढ़ा → होम लोन, कार लोन, बिजनेस लोन की EMI बढ़ेगी
- रेपो रेट घटा → EMI कम होगी
3. आर्थिक विकास पर प्रभाव
कम रेपो रेट निवेश और व्यापार को बढ़ावा देता है, जिससे GDP की वृद्धि तेज हो सकती है। वहीं अधिक रेपो रेट अर्थव्यवस्था को धीमा कर सकता है ताकि अधिक गर्म हो चुकी अर्थव्यवस्था को नियंत्रित किया जा सके।
रेपो रेट तय करने का काम
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) में एक खास समिति होती है जिसे मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee – MPC) कहा जाता है। यही समिति हर दो महीने में बैठकर यह फैसला करती है कि रेपो रेट बढ़ाना है, घटाना है या वैसा ही रखना है।
कौन-कौन होते हैं MPC में?
MPC में कुल 6 सदस्य होते हैं:
-
RBI के गवर्नर (अध्यक्ष)
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RBI के 1 डिप्टी गवर्नर
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RBI का 1 और सदस्य
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सरकार द्वारा चुने गए 3 अर्थशास्त्री
यानी, रेपो रेट RBI की मौद्रिक नीति समिति मिलकर तय करती है।
रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट का अंतर
विशेषता | रेपो रेट | रिवर्स रेपो रेट |
|---|---|---|
| अर्थ | RBI बैंकों को उधार देता है | बैंक RBI को उधार देते हैं |
| उद्देश्य | तरलता बढ़ाना | बाजार से पैसा निकालना |
| असर | लोन महँगे/सस्ते होते हैं | बैंक RBI में पैसा पार्क करते हैं |
एक उदाहरण से समझें
मान लें रेपो रेट 6% है। अगर एक बैंक RBI से ₹1,000 करोड़ उधार लेता है, तो उसे 6% सालाना ब्याज देना होगा अगर RBI रेपो रेट 7% कर दे, तो बैंक के लिए पैसा महँगा हो जाएगा और वह ग्राहकों को भी महँगा लोन देगा।
निष्कर्ष:
रिज़र्व बैंक जब बैंकों को पैसे उधार देता है, उस पर जो ब्याज लेता है, उसे रेपो रेट कहते हैं।रेपो रेट भारतीय अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण मौद्रिक उपकरण है। यह महँगाई नियंत्रित करने, बाजार में तरलता बनाए रखने और आर्थिक विकास की गति तय करने में अहम भूमिका निभाता है। किसी भी व्यक्ति के लिए, चाहे वह व्यापारी हो, निवेशक हो या आम नागरिक, रेपो रेट को समझना आवश्यक है क्योंकि इसका सीधा असर लोन की EMI से लेकर रोजमर्रा की कीमतों तक पर पड़ता है।

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